बालक सी मचल उठने वाली आत्मा,
शान्त सी छुपी बैठी है,
अन्दर ही कोने में कहीं,
डरी दुपकी बैठी है,
एक दाग लग गया है चेहरे पर उसके,
असमंजस में हैरान बैठी है,
गहरी स्याही में लिप्त,
ठिठुरती हुई, छुपी बैठी है,
शाम के बोझिल संसार के इंतज़ार में,
छुप जाने छुपी बैठी है,
गुमनाम हो जाने, भीड़ में खो जाने, छुपी बैठी है |
अंधकार अन्दर कम नहीं,
उसे जाने किसका इंतज़ार है,
शायद कुछ और अंधकार के इंतज़ार में छुपी बैठी है |
दिन का गम नहीं उसे,
न रात बहुत प्यारी है,
बस एक नए, पहर के इंतज़ार में छुपी बैठी है |
कितने लम्हे आये, और कितने लम्हे गये,
जाने किस लम्हे के इंतज़ार में छुपी बैठी है |
कभी कभी खुद से, हलकी सी एक आवाज़ में,
कुछ सवाल करती है, फिर उन्ही सवाल पे हलके से सिसकती है |
गुमराह नहीं है, शायद थोड़ी है भी,
शायद किसी राह की साह में छुपी बैठी है |
बालक सी मचल उठने वाली आत्मा,
शान्त सी छुपी बैठी है |
वर्तमान क्या है? भूत कितना अनमोल है?
आने वाले कल के इंतज़ार में छुपी बैठी है |
दिशा नहीं है, है भी तो क्या है,
शायद एक भ्रम, शायद एक छलावा,
किसी मतलब समझाने वाले के, इंतज़ार में छुपी बैठी है |
गुमसुम तो पहले भी थी, गुमराह भी थी,
पर यह डर एक नया एहसास है,
शायद नए मायने समझ आने लगे हैं,
संसार के शोर में, रुंधे गले से एक आवाज़ निकाल,
खुद को आश्वस्त करती है, कि कहीं मूक तो नही हो गई,
किसी शोर समझाने वाले के इंतज़ार में छुपी बैठी है |
बालक सी मचल उठने वाली आत्मा,
शान्त सी छुपी बैठी है |