एक ताल है कहीं, कुछ भरा कुछ सूखा |
एक गीत है कुछ अधूरा सा,
एक मीत है कुछ भूला सा |
झुकी हुई सी एक वादी है,
एक नदी है कुछ रुकी सी |
सब कुछ जैसे स्थिर है,
ऐसा लगता है मानो स्वप्नलोक हो!
लेकिन स्वप्न भी कुछ धुंधला ही है,
कोहरे के उस पार कुछ आग दीख पड़ती है|
शायद मन ने धुंए को काट कोई कल्पना बुन ली है|
पीड़ित मानस को बहलाने के लिए एक भ्रम रच लिया है|
स्थिति गंभीर नहीं है,
शायद आदत हो चुकी है!!!
दर्द को कम करने में,
शायद चेतना खो चुकी है|
बस एक नशा है,
इस भ्रम में चूर हैं|
शायद दर्द के दर से,
हम मजबूर हैं|
अपने चारों ओर एक जाल बुन लिया है,
सुनहरे रेशम से जिसे ढक लिया है|
बाहर से सब अच्छा, सब भला है,
बुनने वालों से पूछो, हर धागा खला है|
कुछ समय सब बहुत अच्छा था,
हर नया धागा एकदम पक्का था,
दर्द जा रहा था, मज़ा वापिस आ रहा था,
हर नया धागा, हर नया झूठ रंग ला रहा था!!!
मन ने बहुत अच्छा काम किया,
धागों से अपने लिए बहुत सुन्दर घर बुन लिया|
लेकिन फिर शायद, धागे कुछ ज्यादा हो गए,
दम घुटने लगा, गुमसुम रहने वाला मन फिर तड़पने लगा|
दवा दर्द बन गयी,
मन छटपटाने लगा,
अपनी ही कैद को देख, घबराने लगा!
सुन्हरी चादर के बोझ में दबने लगा,
अपने ही रचे सुरक्षाजाल से डरने लगा!
धीरे-धीरे घबराने लगा,
अपनी ही सोच से सकुचाने लगा!
और वक़्त जैसे दो क्षण फिर से रुक गया,
अपनी ही भूल में, यह मन दब गया!
मैं खड़ा इस आत्महत्या को देखता रहा,
क्या करता मैं भी मन का मोहताज था,
मैं मन का और मन मेरा पहरेदार था,
अब वो वहाँ मृत पड़ा है,
और में यहाँ अधमरा.....
बदहवास मैं कई दिन उसके घर की दीवारों पर कान लगाए खड़ा रहा...
कुछ दिन बाद अचानक कुछ सुनाई पड़ा,
कुछ हलकी हलकी हलचल है,
मासूम मन के दाँत निकल आयें हैं,
वो धीरे-धीरे धागों को काट रहा है,
डर लगता है, की कहीं इस विकार से,
खुद को हैवानियत में न खो दे,
पर कम से कम वो जग रहा है,
एक नयी शुरुआत है!!!